अँधेरे कि अब हम को बिल्कुल ही आदत नहीं रही , अंधेरा हमको अच्छा नहीं लगता , असल में अंधेरे को लेकर हमारे मन में कई तरह के भय होते हैं इतना ही नहीं अंधेरे को हमेशा अज्ञानता के साथ जोड़ा गया है लेकिन अब दुनिया में अंधेरा गायब हो रहा है दुर्लभ हो रहा है तो आज के लेख में हम आपको बताएंगे कि अंधेरा हमारी पृथ्वी के लिए क्यों जरूरी है और जरूरत से ज्यादा प्रकाश कैसे खतरनाक साबित हो रहा है 



19वीं सदी में जब पहली बार बिजली का बल्ब जला तो यह क्रांति थी रात अचानक दिन में तब्दील हो गई बिजली की रोशनी के चलते हम दिन और रात की परवाह किए बिना यात्राएं कर सकते हैं ,और काम कर सकते हैं जब चाहे पार्टी कर सकते हैं ,बल्ब बनाने वालों ने भी नहीं सोचा होगा कि उनका उनका आविष्कार इस कदर दुनिया पर छा जाएगा अब तो बहुत सी जगहों पर बिजली की रोशनी के चलते हैं प्राकृतिक अंधेरा गायब ही हो गया है आज दुनिया की 80 फ़ीसदी से भी अधिक की आबादी को घने अंधेरे वाला आकाश नहीं दिखाई देता मसलन सिंगापुर मैं इतनी अधिक  रोशनी रहती है कि लोग अंधेरे को देखना ही भूल गए हैं 



लेकिन अब वैज्ञानिक रात में कृत्रिम प्रकाश यानी आर्टिफिशियल लाइट के खतरों के प्रति आगाह कर रहे हैं वे रात के समय कृत्रिम रोशनी एक तरह से प्रदूषण की तरह देख रहे हैं बीती सदी में औद्योगिकीकरण की वजह से कृत्रिम प्रकाश का इस्तेमाल बहुत अधिक बढ़ गया है खासकर एशियाई देशों में इस नक्शे

में देखा जा सकता है कि भारत में 2012 से 2016 के बीच कृत्रिम प्रकाश देने वाली कितनी ज्यादा लाइटें लगाई गई हैं जरूरत से ज्यादा जगमग यानी प्रकाश प्रदूषण जिसे अंग्रेजी में लाइट पोलूशन कहते हैं इसका हम पर और हमारे पर्यावरण पर क्या असर पड़ता है यह इस लेख में हम आपको आगे जरूर बताएंगे लेकिन उससे पहले हम आपको एक कहानी पढ़ाते हैं 


" बात 1994 की है 17 जनवरी को अमेरिका के शहर लॉस एंजेल्स में एक भूकंप आया वही लॉस एंजेल्स जहां से हॉलीवुड चलता है और जो अपने कसीनो और चकाचौंध के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है भूकंप 6.6 तीव्रता का था रात का समय था अफरा तफरी मच गई लोग बदहवास थे कई लोगों ने पुलिस को फोन किया कि हिलती हुई धरती को लेकर वह लोग तो डर ही रहे हैं लेकिन उससे कहीं ज्यादा डर उन्हें आसमान को देख कर लग रहा है आसमान में कुछ जगमग आ रहा है टिमटिम आ रहा है दरअसल यह लोग तारों से भरे आकाश को देखकर डर गए थे बिजली चले जाने से इतना अंधेरा हो गया था कि उन्हें आकाशगंगा बिल्कुल साफ दिखाई दे रही थी लॉस एंजेल्स के बहुत सारे लोगों ने पहली बार यह नजारा देखा था तो शायद आप इस कहानी से अंधेरी की अहमियत को समझ गए होंगे" 

क्या हो अगर मधु मक्खियाँ पूर्णतः समाप्त हो जाए ?

वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि कृत्रिम रोशनी से ना केवल आंखों में तकलीफ होती है बल्कि इससे नींद ना आने मोटापा और कई बार डिप्रेशन जैसे कई समस्याएं भी पैदा होने लग जाती हैं कुछ रिसर्च यह भी कहते हैं कि रात की शिफ्ट में काम करने वाली महिलाओं में आर्टिफिशियल लाइट के लगातार संपर्क में रहने से स्तन कैंसर का खतरा लगातार पढ़ता रहता है कृत्रिम रोशनी से हमारे शरीर की लाइव प्रभावित होती हैं और इससे ब्लड प्रेशर और पाचन तंत्र से जुड़ी समस्याएं भी हो सकती हैं 


कोरल , पक्षियों और बहुत सारे वन्यजीवों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है जब रात में अंधेरे की वजह है रोशनी होती है अंडों से निकले कछुआ के बच्चों को समुंदर में जाना होता है उस स्थिति में कृत्रिम रोशनी होने के कारण वे रास्ते भटक जाते हैं इससे उनकी जान भी जा सकती हैं रात में आर्टिफिशियल लाइट से कीड़ों की आबादी में बड़ी गिरावट आ रही है एक अध्ययन बताता है कि जर्मनी में गर्मियों के मौसम में   100 अरब कीड़े मारे जाते हैं कीड़े हीं होंगे तो परागण नहीं होगा जिस पर दुनिया  के खाद्य उत्पादन का एक तिहाई हिस्सा निर्भर है पेड़ों पर भी कृत्रिम रोशनी का बहुत दुष्प्रभाव पड़ता है 

कैसी होगी 50 साल बाद कि दुनिया ?

" मुंबई में रहने वाले नीलेश देसाई प्रकाश प्रदूषण के खिलाफ सबसे मुखर वालों में से एक हैं वह अपने परिवार के साथ सातवीं मंजिल में रहते हैं लेकिन उनके घर के पास एक स्टेडियम है जिसकी फ्लड लाइटें रात 12:00 बजे तक जलती थी और सुबह 3:00 बजे फिर जगमग हो जाती थी उनका तो समझो सोना ही मुहाल हो गया ना फिर पर्दो दे काम  चला ना स्लीपिंग मस्क से उन्होंने शिकायत की लेकिन कुछ नहीं हुआ फिर उन्हें लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी इसके बाद जाकर स्टेडियम को आदेश दिया गया कि रात में फ्लड लाइटें बंद कर दीजाएं अब नीलेश लोगों को प्रकाश प्रदूषण के प्रति जागरूक करते हैं " 


यह तो रही देश के कुछ जागरूक लोगों की बात लेकिन हम और आप क्या कर सकते हैं प्रकाश प्रदूषण से निपटने के लिए तो चलिए जान लेते हैं 


  • बत्ती तभी चलाइए जब आपको जरूरत हो और काम हो जाए तो बंद कर दीजिए 
  • लैंपशेड इस्तेमाल कीजिए ताकि प्रकाश इधर उधर ना जाए 
  • हल्की लाइटें जलाई है वह बेहतर रहेंगी जितनी कम रोशनी होगी उतना अच्छा होगा 
  • डिम लाइट की आदत डालें 


पूरा शहर या पूरा देश इन बातों पर अमल कर सकता है जैसा कि फ्रांस मैं स्काईबीम को बैन कर दिया गया है इकोलॉजी के हिसाब से संवेदनशील इलाकों का खास ध्यान रखा जा रहा है कि वहां रोशनी ज्यादा ना हो कई जगहों पर समय तय कर दिया गया है जब सामने की स्थानों पर लाइटों को डिम किया जाता है या फिर बंद ही कर दिया जाता है 


उम्मीद है कि अब तक आप अंधेरे की अहमियत को समझ चुके होंगे यह बात सही है कि अंधेरे में देखने के लिए इंसानों को रोशनी की जरूरत होती है लेकिन रोशनी उतनी ही रखिए जितनी जरूरी हो इस बात को खुद ही समझ है और दूसरों को भी समझाइए प्रदूषण कोई भी अच्छा नहीं होता ना वायु प्रदूषण ना जल प्रदूषण नाही प्रकाश प्रदूषण 


तो आज के लेख में बस इतना ही हमारा यह लेख आपको कैसा लगा हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताइए आपकी प्रतिक्रियाओं का हमें बड़ी से बेसब्री से इंतजार रहता है आपका बहुत-बहुत धन्यवाद